
चुनाव, विश्वसनीयता और राहुल गांधी: भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़े कठिन प्रश्न
भारतीय लोकतंत्र का यह दुर्भाग्यपूर्ण इतिहास रहा है कि चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्था—चुनाव आयोग—पर समय-समय पर प्रश्न उठते रहे हैं। यह आरोप नए नहीं हैं, पर हाल के वर्षों में जिस तीव्रता से उठे हैं, वह चिंता बढ़ाते हैं। विशेष रूप से बिहार जैसे बड़े राज्य में जब विशेष मतदाता सूची पुनर्निरीक्षण (Special Summary Revision) के दौरान लाखों नाम हटाए या जोड़े गए—वह भी कई इलाकों में सीमित सार्वजनिक सूचना के साथ—तभी से राजनीतिक हलकों में आशंका का माहौल बन गया था।
## राहुल गांधी और “वोटर सर्जरी” की बहस
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बीते तीन वर्षों में “वोट चोरी” और “चुनावी प्रणाली की पारदर्शिता” को लेकर लगातार मुद्दे उठाए हैं। आंदोलन किए, यात्राएँ निकालीं, चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं पर सवाल रखे। लेकिन बिहार चुनाव में, तमाम आशंकाओं के बावजूद, कांग्रेस का चुनाव में उतरना उनके आलोचकों को सवाल उठाने का मौका दे गया।
राहुल गांधी की छवि, जो पिछले वर्षों में एक “प्रणालीगत बदलाव” की आवाज बनकर उभरी थी, अचानक संदेह के घेरे में दिखाई देने लगी—खासकर उन लोगों की नजर में जो वोटर लिस्ट में कथित अनियमितताओं को लेकर लगातार आंदोलित थे।
कांग्रेस के भीतर भी यह भावना है कि यदि पार्टी “वोट चोरी” को इतना बड़ा मुद्दा मानती है, तो फिर ऐसे चुनावों में भाग लेने का निर्णय क्या राजनीतिक रूप से सही था?
## रणनीतिक विफलता या संगठनात्मक कमजोरी?
बीजेपी और उसके शीर्ष रणनीतिकारों के आत्मविश्वास की चर्चा अक्सर होती है, पर उसके पीछे प्रशासनिक और चुनावी मशीनरी के “प्रबंधन कौशल”—या आलोचकों की भाषा में “सर्जरी”—को विपक्ष बार-बार निशाने पर लेता है। बिहार में ज्ञानेश कुमार का नाम इसी संदर्भ में उछला।
कांग्रेस अंदर से जानती है कि उसके पास वैसा संगठनात्मक ढांचा नहीं है, जैसा विपक्ष की राजनीति को कठिन समय में चाहिए। कई राज्यों में “ब्लॉक लेवल एजेंट” बनाए जरूर जाते हैं, पर जमीन पर उनकी सक्रियता अक्सर शून्य रहती है। राजस्थान इसका नया उदाहरण है, जहां पुनर्निरीक्षण जारी है और दावे बहुत हैं पर धरातल पर उपस्थिति नगण्य।
कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या संगठन नहीं, बल्कि संगठन संस्कृति है—जहां सत्ता में रहते कार्यकर्ता हाशिए पर चले जाते हैं, और विपक्ष में रहते समय नेतृत्व उन्हीं कार्यकर्ताओं से उम्मीद करता है कि वे चट्टान बनकर खड़े हों।
## क्या कांग्रेस को बड़े फैसले की जरूरत है?
यह कड़वी सच्चाई है कि कोर्ट सुन नहीं रहा, चुनाव आयोग मान नहीं रहा, और हर चुनाव—चाहे वह मध्य प्रदेश हो, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा या बिहार—लगभग एक ही पैटर्न दोहरा रहा है।
ऐसे में एक बड़ा प्रश्न राहुल गांधी के सामने खड़ा है: “क्या कांग्रेस को ऐसे चुनावों का बहिष्कार करना चाहिए जहाँ चुनाव आयोग की भूमिका संदेह के दायरे में हो?”
बहिष्कार लोकतंत्र का समाधान नहीं होता, पर कभी-कभी यह लोकतंत्र को जगाने का माध्यम बन सकता है—यदि उसके साथ व्यापक जन-आंदोलन खड़ा किया जाए।
क्योंकि केवल “लोकतंत्र बचाओ” नारा लगाने से लोकतंत्र नहीं बचता; जनता को यह *महसूस* भी होना चाहिए कि कोई राजनीतिक दल उनके साथ खड़ा है, उनका विश्वास जीतने को तैयार है, और चुनावी प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता पर समझौता करने को तैयार नहीं।
## कांग्रेस की विश्वसनीयता बनाम लोकतंत्र की विश्वसनीयता
हर चुनाव के बाद यदि विपक्ष यह कहे कि “वोट चोरी हुई है”, और फिर अगले चुनाव में बिना शर्त शामिल भी हो जाए—तो यह केवल विपक्ष की विश्वसनीयता को नहीं बल्कि लोकतांत्रिक शिकायतों की गंभीरता को भी कमजोर करता है।
इसलिए यह दौर राहुल गांधी के लिए निर्णायक है:
* वे लोकतंत्र की विश्वसनीयता बचाएँगे,
या
* अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता को बार-बार चोट खाते देखते रहेंगे।
क्योंकि जो सवाल अब उठ रहे हैं, वे केवल राजनीति के सवाल नहीं हैं—वे भारत के लोकतांत्रिक विश्वास का सवाल हैं।